Sunday, September 21, 2014

manav ke hatyare

दुनिया अजीबो गरीब है कब क्या हो कहाँ कुछ पत्ता नहीं चलता है कुदरत के नियम निराले है ,कही सुख परता है तो कही बाढ़ आती है ,कही भूकम्प तो कही ज्वालामुखी ,जिंदगी की इन्ही विचित्र क्रियाओ से इंसान सोच में पढ़ जाता है पर वो बेबस है लाचार है कुछ भी नहीं कर सकता ,साइंस खली यूही  भखान  करती रहती है ये क्या ,ये फायदा पर क्या ? चाँद पर जाने के लिए अरबो रुपये  डाले ,पर कुछ नहीं हुआ। यह कैसा इंसान है कुदरत की बनाई चीज पर रशक  करता है ,अपने आप को ज्यादा होशियार समझता है ,बीमारियो के इलाज़ तो ढूढ़ता नहीं है चला है चाँद के पास। पूरे विश्व में करोड़ो  लोग रोज़ भूखे सोते है पर उनकी किसी को परवाह नहीं है ,करोड़ो  बच्चे बीमार होकर मर जाते है कोही देखने और सुन ने वाला नहीं है ,आखिर ये दुनिया किस राह पर चल रही है ?
ये नेता ,ये समाज सेवक ,ये मानव हितकारी संघ क्या कर रहे है ?
करोड़ो  अरबो रुपये की रोटियां और गेहू पानी में बह रहा है ,कौन जिम्मेदार है ? उसे सज़्ज़ा क्यों नहीं ? असली मानव के हत्यारे ये ही है ,इंसानो के दुश्मन।
काश कोही तो होता जो इनको कटगरे  में खढ़ा करता।