Sunday, June 12, 2016

saheliya

कहाँ गई वो बचपन की रंग बिरंगी तितलियाँ 
कहाँ गए वो बाग़ बगीचे जो रस्ते में परते  थे 

कहाँ गया  वो खिलखिलाना जिसे देख भीड़ इकठी होती थी 
माँ की डांट पिता की नज़रे रोज़ सहती थी 

कहाँ गया वो सहेलियों का झुण्ड जो हरदम घेरे रहता था 
अध्यापक की डांट  और सजा हमेशा स्कूल में परती  थी 

क्या शादी के बाद यह सब होता है सिर्फ एक इंसान हमेशा देखता है 
कहाँ गए वो मस्त नज़ारे और कहकहे जिन्हे सुन दिल गदगद होता था 

घेरती  रहती थी आँखे मुझे चारो और से जब घर से स्कूल जाती थी में 
अब सुनसान नज़र आती है सड़ के मुझे साजन के घर की