कुदरत की बनाई इस दुनिया में ईशवर ने कितने रंग बिखेर रखे यह देख देख कर मन खिल उठता है और मष्तिक ईशवर के चरणों में झुक जाता है और जबान से शब्द फूट परते है कि 'वाह मालिक किस शब्दों में में तेरा शुक्रिया करू की तेने मुझे इस धरती पर बेझ कर मुझे स्वर्ग में भेज दिया है जिसे नित्य में देख देख कर तेरा क्रत्यग हु ये हरयाली ये पतझर ,ये फूलो की वादिया ,ये उचे उचे पहाढ़ ,ये नदी और नाले ,ये रंगों की छटा बिखेरते हुए तरह तरह के आसमान में उरते हुए पक्षी और धरती पर विचरढ़ करते हुए तरह तरह के जानवर ,और फिर बदलता हुआ मौसम जिसकी छटा ही निराली है आसमान में गुमरते हुए बादल अलग ही निखार लाते है और फिर धरती को हरा भरा करने को बरस परते है जिससे मन प्रफुल्लत हो उठता है कुदरत की अध्बुद छटा देख कर मन नाचने लगता है और मोर अपने पंख खोल देता है सर फिर अनानास ही ईश्वर के चरणों में स्वत ही झुक जाता है और जबान से क्रत्यगा के शब्द फूट परते है "वाह मालिक वाह तेरा किन शब्दों में शुक्रिया करू मेरे पास शब्द ही नहीं है "
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