कहाँ गई वो बचपन की रंग बिरंगी तितलियाँ
कहाँ गए वो बाग़ बगीचे जो रस्ते में परते थे
कहाँ गया वो खिलखिलाना जिसे देख भीड़ इकठी होती थी
माँ की डांट पिता की नज़रे रोज़ सहती थी
कहाँ गया वो सहेलियों का झुण्ड जो हरदम घेरे रहता था
अध्यापक की डांट और सजा हमेशा स्कूल में परती थी
क्या शादी के बाद यह सब होता है सिर्फ एक इंसान हमेशा देखता है
कहाँ गए वो मस्त नज़ारे और कहकहे जिन्हे सुन दिल गदगद होता था
घेरती रहती थी आँखे मुझे चारो और से जब घर से स्कूल जाती थी में
अब सुनसान नज़र आती है सड़ के मुझे साजन के घर की
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