Friday, August 13, 2010

shanti

कितना न अच्छा लगता है यह सोच कर कि यह दुनिया और दुनिया के लोग शांति के पुजारी है और चारो और शांति के लिए घूम रहे है जिसकी कल्पना बरसो से यह मानव कर रहा है जिसमे मानव कि प्रगति प्यार भाईचारा न जमीं  का झगरा न जाति का झगरा न धर्म का झगरा सिर्फ प्यार और प्यार और मानव कि प्रगति चारो और मिल कर यह आभास मात्र से मन पुलकित हो उठता है इस सर्व शक्तिमान ईश्वर ने यह दुनिया कितनी न सुंदर बनाई जिसको बार बार देखने को जी करता है और उसे घंटो निहारता ही रहता है उस परवरदिगार कि लीला देख कर कि हमारे लिए उसने कितना न सोचा होगा कि इस अध्बुध इन्सान को सब सुख मिले वोह आराम से ईश्वर कि इस्तुती कर सके उसे याद  कर सके कि है परवरदिगार तुम्हे लाख लाख शुक्रिया कि तुमने इतनी सुंदर रचना हम लोगो के लिए कि और हमें इस संसार में भेजा पर यह क्या इन्सान यहाँ आकर ये कैसा हो गया आपस में जमीं बाँट दी ,अपने अपने धर्म बना दिए  जातियां बना दी यह कैसी कैसी रचना कर दी सिर्फ अपने फाइदे के लिए और मजे कि बात यह कि उसे मालूम है कि वोह इस दुनिया में सिर्फ मेहमान है वोह भी चंद दिनों का और लेके भी कुछ जाने वाला नहीं है फिर   यह सब किसके लिए? काश यह सब समज पाते तो दुनिया और दुनिया में रहने वालो का नक्षा ही अलग होता अब भी समय नहीं गया है और अब ज्यादा जरुरत है कि शांति और शांति और शांति

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