Monday, February 14, 2011

money

अजीब सा माहोल है इस लुटती हुई दुनिया में
हर इक शख्स जेबे भरने में लगा हुआ है
कहा ले जाएगा ,क्या करेगा ,नहीं खबर उसे
देख देख कर रोज़ खुश होता है इसे देख कर
लेकिन दे नहीं पाता किसी जरुरतमंद को कभी भी
मुस्कराता है हस्ता है इसे देख देख कर
पर नहीं करता खर्च अपने पर भी इक पल
और पत्ता चला इक दिन ,टूटती सांस इक पल
भिखर के रह गए दस्ते नोटों  के
कि ले ग़ही सरकार अपने खजाने में
खामोश रह गही वो हसने कि जगह ,न नोट रहे ,न नोटों वाला

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